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Thursday, 11 February 2016
Sunday, 7 February 2016
अत्र कुशलम् तत्रास्तु
||अत्र कुशलम् तत्रास्तु ||
मित्र को स्नेह मिलन.... .
परिवार में
बड़ों को प्रणाम कहना
छोटों को प्यार
अन्य सभी को नमस्कार कहना,
अत्र कुशलम् तत्रास्तु....
पूरी सर्दी तुम्हारी
चिट्ठी की इंतजार में बीती !
क्यों बिसरा दी तुमने
बचपन को वो प्रीती !!
ना चिट्ठी ना पत्री भेजी
ना कोई खबर सार ही पूछी
दोस्त को भूल गए हो शायद
पोस्टकार्ड पर__
दो लाइन भी नहीं लिख भेजी !!
हुई हड़ताल खतम अब
तुम चिन्ता ना करना
अपने, आस-पास के
हाल समाचार___
चिट्ठी में लिख कर भेजना,
याद आता है अब भी
जंगल में मिलकर जाना
पेड़ों से फिसलकर
चोटी पर पहुंच, इतराना,
बदल रहा है मौसम
अपना ख्याल रखना
पत्र मिलते ही
तुरंत जवाब लिखना,
थोड़े लिखे को__
ज्यादा समझना
पास पड़ोस में
सबको यथा योग्य
प्यार और प्रणाम कहना,
कुशलता के साथ
पत्र की प्रतीक्षा में
तुम्हारा लंगोटिया यार
विजय जयाड़ा दिल्ली में ...
परिवार में
बड़ों को प्रणाम कहना
छोटों को प्यार
अन्य सभी को नमस्कार कहना,
अत्र कुशलम् तत्रास्तु....
पूरी सर्दी तुम्हारी
चिट्ठी की इंतजार में बीती !
क्यों बिसरा दी तुमने
बचपन को वो प्रीती !!
ना चिट्ठी ना पत्री भेजी
ना कोई खबर सार ही पूछी
दोस्त को भूल गए हो शायद
पोस्टकार्ड पर__
दो लाइन भी नहीं लिख भेजी !!
हुई हड़ताल खतम अब
तुम चिन्ता ना करना
अपने, आस-पास के
हाल समाचार___
चिट्ठी में लिख कर भेजना,
याद आता है अब भी
जंगल में मिलकर जाना
पेड़ों से फिसलकर
चोटी पर पहुंच, इतराना,
बदल रहा है मौसम
अपना ख्याल रखना
पत्र मिलते ही
तुरंत जवाब लिखना,
थोड़े लिखे को__
ज्यादा समझना
पास पड़ोस में
सबको यथा योग्य
प्यार और प्रणाम कहना,
कुशलता के साथ
पत्र की प्रतीक्षा में
तुम्हारा लंगोटिया यार
विजय जयाड़ा दिल्ली में ...
Friday, 5 February 2016
Friday, 29 January 2016
तूफानी काका
तूफानी काका
मस्ती में थे हाथी काका
झूम रहे थे हाथी काका
सूंड उठाते कभी गिराते
पत्तियां खा रहे थे काका ..
झूम रहे थे हाथी काका
सूंड उठाते कभी गिराते
पत्तियां खा रहे थे काका ..
Thursday, 28 January 2016
ठहर रे मन
ठहर रे मन
ठहर ! रे मन बैठ
मन भर__
बतिया लूँ यहाँ
बहुत दिन हुए
बिछोह के
जीवन से मिल लूँ
कुछ पल अब यहाँ..
मन भर__
बतिया लूँ यहाँ
बहुत दिन हुए
बिछोह के
जीवन से मिल लूँ
कुछ पल अब यहाँ..
चलते फिरते हैं बुत
महानगरों के
सड़कों चौराहों पर,
दूभर हुआ
आदम से मिलना
घर में और चौबारों पर ..
महानगरों के
सड़कों चौराहों पर,
दूभर हुआ
आदम से मिलना
घर में और चौबारों पर ..
बदला मनुज !!
मगर__
नहीं बदली प्रकृति
वो है यहाँ
ठहर ! रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ मैं अब यहाँ ....
मगर__
नहीं बदली प्रकृति
वो है यहाँ
ठहर ! रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ मैं अब यहाँ ....
मूक हैं तरु झाड़ घास
फिर भी
सरगम बहता यहाँ !
बोल हैं शहरों में बेशक
मगर___
उठती कर्कश ध्वनियाँ वहाँ !
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ में अब यहाँ ...
फिर भी
सरगम बहता यहाँ !
बोल हैं शहरों में बेशक
मगर___
उठती कर्कश ध्वनियाँ वहाँ !
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ में अब यहाँ ...
हैं पाषाण वो
प्रीत उनमें है यहाँ
ईंटों के जंगल में है बसर
मगर___
सुकून ऐसा कहाँ !
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ जीवन से यहाँ ...
प्रीत उनमें है यहाँ
ईंटों के जंगल में है बसर
मगर___
सुकून ऐसा कहाँ !
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ जीवन से यहाँ ...
भटकता फिर रहा
तू कहाँ कहाँ
बिछड़ा था जीवन
वो है यहाँ
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ उससे यहाँ ..
तू कहाँ कहाँ
बिछड़ा था जीवन
वो है यहाँ
ठहर रे मन बैठ
कुछ पल
बतिया लूँ उससे यहाँ ..
.. विजय जयाड़ा 28.01.16
Tuesday, 26 January 2016
मिलन
>> मिलन <<
नर्म हसरतें
कल्पना की चिकनी
सतह पर
बहुत दूर तक
किनारे की चाह में
फिसलती चली गई
बिना रुके !
समय सरकता है
आगे बढ़ता है
भला उसे कौन
रोक सकता है!
किनारा ! हसरतों से बेपरवाह
लहरों के करीब
नर्म स्पर्श में खो गया!
हवाओं की
सरगम में रम गया
हसरतों से दूर
बहुत दूर होता गया !
हसरतें थक हार
बेढौल खुरदरे
पत्थर हो गई
रेत में धंस गई
किनारे की जिद में
स्थिर हो गई ! एक जगह !!
सोचकर !
किनारा उनके करीब
जरूर आएगा !!
सावन में !
उन्मादी लहरों के
कहर से जब
किनारा कराहेगा !
हवाओं का सरगम
भयानक स्वर बन
उसे डराएगा !
तब किनारा सिकुड़कर
हसरतों के पास
दौड़कर आएगा !!
दोनों का मिलन हो पायेगा !!
... विजय जयाड़ा 20.01.16
कल्पना की चिकनी
सतह पर
बहुत दूर तक
किनारे की चाह में
फिसलती चली गई
बिना रुके !
समय सरकता है
आगे बढ़ता है
भला उसे कौन
रोक सकता है!
किनारा ! हसरतों से बेपरवाह
लहरों के करीब
नर्म स्पर्श में खो गया!
हवाओं की
सरगम में रम गया
हसरतों से दूर
बहुत दूर होता गया !
हसरतें थक हार
बेढौल खुरदरे
पत्थर हो गई
रेत में धंस गई
किनारे की जिद में
स्थिर हो गई ! एक जगह !!
सोचकर !
किनारा उनके करीब
जरूर आएगा !!
सावन में !
उन्मादी लहरों के
कहर से जब
किनारा कराहेगा !
हवाओं का सरगम
भयानक स्वर बन
उसे डराएगा !
तब किनारा सिकुड़कर
हसरतों के पास
दौड़कर आएगा !!
दोनों का मिलन हो पायेगा !!
... विजय जयाड़ा 20.01.16
Friday, 22 January 2016
मूढ़ मन
मूढ़ मन
सदियों से अविरल सघन
अपनी धुन में सदा मृदुल मगन
जड़ चेतन सबका का प्राण वो
बुझाती विचलित मन की अगन ...
अपनी धुन में सदा मृदुल मगन
जड़ चेतन सबका का प्राण वो
बुझाती विचलित मन की अगन ...
निरंतर बह रही प्रवाहमयी
नहीं उसके मन में भेद कोई
वात्सल्यमयी हर बूँद उसकी
पराया उसके लिए नहीं है कोई ..
नहीं उसके मन में भेद कोई
वात्सल्यमयी हर बूँद उसकी
पराया उसके लिए नहीं है कोई ..
घाट निषेध न उसने किया
पास आकर न प्यासा कोई रहा
सत्य बिखरा माँ गंगे ! तट तेरे
मन मूढ मेरे ! क्यों भटकता रहा !
.. विजय जयाड़ा
पास आकर न प्यासा कोई रहा
सत्य बिखरा माँ गंगे ! तट तेरे
मन मूढ मेरे ! क्यों भटकता रहा !
.. विजय जयाड़ा
Wednesday, 20 January 2016
लौटते बादल
>लौटते बादल<
एकान्त में दबे पाँव
उसका चले आना
और फिर
संग बिताये
पलों की यादों में
देर तक
दोनों का खो जाना
वक्त न जाने कब
पंख लगाकर उड़ गया !
मगर ___
अचानक उसका
बिछुड़कर फिर कभी
वापस न आ सकने की
मजबूरी__
रुंधे स्वर में बताकर
एकाएक
पलटकर चल देना !!
जैसे सावन में
पनेरे बादलों का
पास आकर भी
बिन बरसे लौट जाना !!
जो बरसेंगे तो जरूर
मगर यहाँ नहीं !!
कहीं और !!
मुझसे दूर ! बहुत दूर !!
.. विजय जयाड़ा . 12.01.16
उसका चले आना
और फिर
संग बिताये
पलों की यादों में
देर तक
दोनों का खो जाना
वक्त न जाने कब
पंख लगाकर उड़ गया !
मगर ___
अचानक उसका
बिछुड़कर फिर कभी
वापस न आ सकने की
मजबूरी__
रुंधे स्वर में बताकर
एकाएक
पलटकर चल देना !!
जैसे सावन में
पनेरे बादलों का
पास आकर भी
बिन बरसे लौट जाना !!
जो बरसेंगे तो जरूर
मगर यहाँ नहीं !!
कहीं और !!
मुझसे दूर ! बहुत दूर !!
.. विजय जयाड़ा . 12.01.16
बल्द्युं मिजाज
मौसम के इस बदली युक्त ठंडे मिजाज पर गढ़वाली में एक प्रयास .. " बल्द्युं मिजाज " .. हिंदी भावार्थ के साथ .. सादर
>बल्द्युं मिजाज<
सर्ग दिदा कु देखा
मिजाज बल्द्युं छ
दिनमान ठंड अर
कुएड़ु भी लग्युं छ ..
मिजाज बल्द्युं छ
दिनमान ठंड अर
कुएड़ु भी लग्युं छ ..
सर्या ह्यूंद मफलर
बक्सों मा धरयां छा
अब मौल्यार एगि
टोपलु भी खुजौणा छां !!
ठंड फिर बौड़ै तैं
नया साल मा ऐगि
सर्ग दिदा कु देखा
मिजाज बदळ गि ...
यनु लग्दु अब तक
ह्युंद दोब बैठ्युँ छौ !
छुट्टी खतम होणा कु
इंतजार कन्नु छौ !!
.. विजय जयाड़ा 19.01.16
...........................
हिंदी भावार्थ ..
>बादली मिजाज<
मौसम का मिजाज देखो
बादली हो गया है
दिन भर ठंड और
कुहरा भी लग गया है
सर्दियों में मफलर
बक्सों में रखे रहे
अब माघ आया तो
टोपी भी खोज रहे !!
ठण्ड लौट कर
नए साल में आ गयी
मौसम का देखो
मिजाज बदल गया
ऐसा लगता है अब तक
सर्दी घात लगाए बैठी थी !
छुट्टी ख़त्म होने का
इंतज़ार कर रही थी !!
बक्सों मा धरयां छा
अब मौल्यार एगि
टोपलु भी खुजौणा छां !!
ठंड फिर बौड़ै तैं
नया साल मा ऐगि
सर्ग दिदा कु देखा
मिजाज बदळ गि ...
यनु लग्दु अब तक
ह्युंद दोब बैठ्युँ छौ !
छुट्टी खतम होणा कु
इंतजार कन्नु छौ !!
.. विजय जयाड़ा 19.01.16
...........................
हिंदी भावार्थ ..
>बादली मिजाज<
मौसम का मिजाज देखो
बादली हो गया है
दिन भर ठंड और
कुहरा भी लग गया है
सर्दियों में मफलर
बक्सों में रखे रहे
अब माघ आया तो
टोपी भी खोज रहे !!
ठण्ड लौट कर
नए साल में आ गयी
मौसम का देखो
मिजाज बदल गया
ऐसा लगता है अब तक
सर्दी घात लगाए बैठी थी !
छुट्टी ख़त्म होने का
इंतज़ार कर रही थी !!
Sunday, 10 January 2016
Monday, 28 December 2015
जटा-जूट तपस्वी
... जटा-जूट तपस्वी ...
सकल वसुधा का ताज हिमालय
अडिग युगों से डटा हुआ,
युगों-युगों से तपस्या लीन जटा-जूट
अविचलित देखो मौन खड़ा..
अडिग युगों से डटा हुआ,
युगों-युगों से तपस्या लीन जटा-जूट
अविचलित देखो मौन खड़ा..
बादल विपत्ति के बहुत से आये
टकराकर यहाँ सब चूर हुए
सरहद का सदा चौकस प्रहरी
आँधियों में भी अटल खड़ा ...
टकराकर यहाँ सब चूर हुए
सरहद का सदा चौकस प्रहरी
आँधियों में भी अटल खड़ा ...
छू लो तुम आकाश को लेकिन
अपनी लघुता का ध्यान धरो
अडिग रहो विपदाओं में कहता
तपस्वी तूफानों में भी खड़ा...
अपनी लघुता का ध्यान धरो
अडिग रहो विपदाओं में कहता
तपस्वी तूफानों में भी खड़ा...
... विजय जयाड़ा / तस्वीर: पुत्री दीपिका जयाड़ा
.. गन हिल मसूरी से हिमालय का एक दृश्य
.. गन हिल मसूरी से हिमालय का एक दृश्य
Monday, 21 December 2015
Saturday, 19 December 2015
Friday, 18 December 2015
वर्चस्व
वर्चस्व
विलग अस्तित्व की चाह में
ठन जाती है शाखों में
और हठ बदल जाती है
वर्चस्व की लड़ाई में
किंकर्तव्यविमूढ़ मूल !
शाखों के जोर से
ढुलकता जूझता
कभी इस तरफ
कभी उस तरफ
साम्य बनाने में
थक कर चूर और मायूस !!
मौन ओढ़ लेता है मूल
और एक दिन__
भरभरा कर
धरती पर गिर जाता है !
सब उजड़ जाता है !!
मूल से विलग हो
कौन स्थिर रह पाया है !
कौन सुखी रह पाया है !!
अब शाखें हैं मगर__
छिटकी सूखती कराहती हुई
दूर तक पसरा
निश्चिंत मूल भी नहीं !!
पसरा है .. तो सिर्फ__
स्याह सन्नाटा लिए पछतावा !!
विजय जयाड़ा 18.12.15
ठन जाती है शाखों में
और हठ बदल जाती है
वर्चस्व की लड़ाई में
किंकर्तव्यविमूढ़ मूल !
शाखों के जोर से
ढुलकता जूझता
कभी इस तरफ
कभी उस तरफ
साम्य बनाने में
थक कर चूर और मायूस !!
मौन ओढ़ लेता है मूल
और एक दिन__
भरभरा कर
धरती पर गिर जाता है !
सब उजड़ जाता है !!
मूल से विलग हो
कौन स्थिर रह पाया है !
कौन सुखी रह पाया है !!
अब शाखें हैं मगर__
छिटकी सूखती कराहती हुई
दूर तक पसरा
निश्चिंत मूल भी नहीं !!
पसरा है .. तो सिर्फ__
स्याह सन्नाटा लिए पछतावा !!
विजय जयाड़ा 18.12.15
Sunday, 13 December 2015
खामोशी
खामोशी
परत दर परत
यादों को खुद में छिपाए
परतें उघडती हैं
धुंधलका छितराने लगता है
घने कुहरे को
सूरज का उजाला
निगलने लगता है
अब अतीत स्पष्ट
नज़र आने लगता है
खट्टी-मीठी यादें
जीवंत हो उठती हैं
गुदगुदाती हैं
जी भर हंसाती हैं
यादों का चलचित्र ज्यों-ज्यों
आगे बढ़ता जाता है
तेजी से कुछ
पीछे छूटता चला जाता है
परत दर परत
धुंध में फिर से
छिपने लगता है !!
तन्द्रा टूटती है ___
यादों के आगोश में समाते
आवरणित होते
अतीत को फिर पाने की
जीने की जिद में
मन मचलने लगता है
लेकिन ____
अतीत वापस नहीं आएगा !!
सोचकर !!
मन मायूस हो खामोशी ओढ़ लेता है !!
विजय जयाड़ा 12.12.15
यादों को खुद में छिपाए
परतें उघडती हैं
धुंधलका छितराने लगता है
घने कुहरे को
सूरज का उजाला
निगलने लगता है
अब अतीत स्पष्ट
नज़र आने लगता है
खट्टी-मीठी यादें
जीवंत हो उठती हैं
गुदगुदाती हैं
जी भर हंसाती हैं
यादों का चलचित्र ज्यों-ज्यों
आगे बढ़ता जाता है
तेजी से कुछ
पीछे छूटता चला जाता है
परत दर परत
धुंध में फिर से
छिपने लगता है !!
तन्द्रा टूटती है ___
यादों के आगोश में समाते
आवरणित होते
अतीत को फिर पाने की
जीने की जिद में
मन मचलने लगता है
लेकिन ____
अतीत वापस नहीं आएगा !!
सोचकर !!
मन मायूस हो खामोशी ओढ़ लेता है !!
विजय जयाड़ा 12.12.15
Wednesday, 9 December 2015
Tuesday, 8 December 2015
दिल्ली
दिल्ली
यौवन पर चढ़ती
उजड़ जाती दिल्ली !
सल्तनत बदलती !
निखर जाती दिल्ली ....
गरजती कभी खामोश
रहती थी दिल्ली !
शंहशाही इशारे पर
थिरकती थी दिल्ली ...
अब शंहशाह रहे न
सल्तनत ही बाकी !
अब दिखती यहाँ..
सिर्फ रवानी जवानी.
दिल हिन्दुस्तां का
धड़कता यहाँ है
रौनक से लवलेज़
हर रोज़ खिलती..
कुछ खास दुनिया से
सबसे निराली !!
सरसब्ज सतरंगी..
हम सबकी दिल्ली ...
उजड़ जाती दिल्ली !
सल्तनत बदलती !
निखर जाती दिल्ली ....
गरजती कभी खामोश
रहती थी दिल्ली !
शंहशाही इशारे पर
थिरकती थी दिल्ली ...
अब शंहशाह रहे न
सल्तनत ही बाकी !
अब दिखती यहाँ..
सिर्फ रवानी जवानी.
दिल हिन्दुस्तां का
धड़कता यहाँ है
रौनक से लवलेज़
हर रोज़ खिलती..
कुछ खास दुनिया से
सबसे निराली !!
सरसब्ज सतरंगी..
हम सबकी दिल्ली ...
..विजय जयाड़ा 28/10/14
अथक पथिक
आज तस्वीर संग्रह में ये तस्वीर दिखी ! भावों को शब्द रूप में गूंथने का एक प्रयास " अथक पथिक "...
अथक पथिक
कठिन राह पर
श्रांत क्लांत चित्त
मजबूर करता है
वहीं रुक जाने को
वहाँ से वापस
लौट जाने को !!
मगर___
पेड़ पौधे लताएं
झुरमुट, पंछी__
सारा हरियल वन
नजदीक चला आता है
दुलारता है,
पथ करीब आकर
मंद मंद बतियाता है
लक्ष्य साधित
पथिकों के
किस्से सुनाता है ___
हौसला बढ़ाता है
उत्साहित हो
उमंगित पथिक
लक्ष्य की तरफ
पुनः बढ़ जाता है !
शायद पथ पर
ठहर गया पथिक
नहीं कहाना है उसे___
पहुंच गया
जो लक्ष्य पर
लक्ष्य साधित__
अथक पथिक
कहलाना है उसे !!
श्रांत क्लांत चित्त
मजबूर करता है
वहीं रुक जाने को
वहाँ से वापस
लौट जाने को !!
मगर___
पेड़ पौधे लताएं
झुरमुट, पंछी__
सारा हरियल वन
नजदीक चला आता है
दुलारता है,
पथ करीब आकर
मंद मंद बतियाता है
लक्ष्य साधित
पथिकों के
किस्से सुनाता है ___
हौसला बढ़ाता है
उत्साहित हो
उमंगित पथिक
लक्ष्य की तरफ
पुनः बढ़ जाता है !
शायद पथ पर
ठहर गया पथिक
नहीं कहाना है उसे___
पहुंच गया
जो लक्ष्य पर
लक्ष्य साधित__
अथक पथिक
कहलाना है उसे !!
... विजय जयाड़ा 06.12.15
Friday, 4 December 2015
Thursday, 3 December 2015
अंतर्मन
अनायास ही गुदगुदाते लम्हे ....
अपनी रचनाओं को प्रकाशन के उद्देश्य से समाचार पत्र या पत्रिका में नहीं भेजता। लेकिन ...
शुक्रगुजार हूँ, संपादक श्री गणेश जुयाल जी व साप्ताहिक पत्र " न्यू एनर्जी स्टेट " परिवार का, कि वो मेरी रचनाओं को फेसबुक से ही चयनित कर प्रकाशन योग्य मानकर मेरा उत्साहवर्धन करते हैं।
पत्र में मेरी रचना "अन्तर्मन " को स्थान देने हेतु " न्यू एनर्जी स्टेट " साप्ताहिक पत्र परिवार का हार्दिक धन्यवाद।
।।अंतर्मन ।।
गऊ सानिध्य
न मिल पाना
महानगरीय मजबूरी है
लेकिन ___
कोई ये मान न ले
गऊ से हमारी दूरी है !
न मिल पाना
महानगरीय मजबूरी है
लेकिन ___
कोई ये मान न ले
गऊ से हमारी दूरी है !
धर्म ग्रन्थों ने मिलकर
गऊ का महत्व
स्वीकारा है
फिर गऊ पर क्यों !!
होता इतना हंगामा है !!
दूध पिया
जननी का हमने
ममता का माँ हम नाम धरें
दूध पिया
गौ का भी हमने
क्यों ममता से इनकार करें !!
इंसान को दूध
पिलाया गऊ ने
मजहब का नहीं भेद किया,
फिर हमने
गऊ को आपस में
मजहब में क्यों बाँट दिया !!
बहुत हुई
गौ धन पर सियासत !!
इस पर अब लगाम करें,
दूध का कर्ज
अन्तर्मन से चुकाएँ___
जीवन अपना धन्य करें...
... विजय जयाड़ा
गऊ का महत्व
स्वीकारा है
फिर गऊ पर क्यों !!
होता इतना हंगामा है !!
दूध पिया
जननी का हमने
ममता का माँ हम नाम धरें
दूध पिया
गौ का भी हमने
क्यों ममता से इनकार करें !!
इंसान को दूध
पिलाया गऊ ने
मजहब का नहीं भेद किया,
फिर हमने
गऊ को आपस में
मजहब में क्यों बाँट दिया !!
बहुत हुई
गौ धन पर सियासत !!
इस पर अब लगाम करें,
दूध का कर्ज
अन्तर्मन से चुकाएँ___
जीवन अपना धन्य करें...
... विजय जयाड़ा
सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहस में
सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहस में
भरे पेट लोगों को फिर जुगाली का बहाना मिल गया,
मगर ____
खाली हंडिया चूल्हे पर रख माँ बहलाती रही और
भूख से बिलखता मासूम भूखे पेट आज फिर सो गया !!
भरे पेट लोगों को फिर जुगाली का बहाना मिल गया,
मगर ____
खाली हंडिया चूल्हे पर रख माँ बहलाती रही और
भूख से बिलखता मासूम भूखे पेट आज फिर सो गया !!
..... विजय जयाड़ा 25.11.15
Tuesday, 17 November 2015
Monday, 16 November 2015
नई सुबह
|| नई सुबह ||
दिन भर
चलने के बाद
जब थकने लगता है
तब रात__
नर्म शाम की
स्नेहिल चादर
हवा में लहराकर
उसे पुकारती है
पास बुलाती है
हौले से उढ़ाकर
दुलारती है,
निद्रा के आगोश में
समा जाता है,
रात की घनी छांव में
थका हुआ पथिक
स्वयं को सुरक्षित पाता है
रोज इस तरह
सो जाता है सूरज __
नई उमंग के साथ
नई सुबह लेकर
सबको जगाने के लिए,
नए उत्साह से
सबके साथ मिलकर
कर्म पथ पर
फिर से चलने के लिए
नए लक्ष्य संधान के लिए ..
Wednesday, 11 November 2015
Sunday, 8 November 2015
Thursday, 5 November 2015
अनहद नाद
||| अनहद नाद |||
घर्षण ध्वनियों को
शब्द रूप देकर
कविता में नहीं
उतारना चाहता !!
आहत नाद से इतर
अन्तस् में उठती
ध्वनियों को शब्दों में
ढालना चाहता हूँ ,
आहत नाद भटकाता है !
तृष्णा जगाता है !
मन में इच्छाओं और
वासनाओं का
उपद्रव भड़काता है !
पहुँच जाता हूँ
उस संसार मे
जहाँ मन अटकता नहीं
वहां ध्वनियाँ हैं
लेकिन घर्षण रहित !!
यही है अनहद नाद...
भटकती चित्त वृत्तियों को
नियंत्रित करती
ध्वनियों का संसार !!
अंतस संगीत संसार में
वहीँ रम जाता हूँ
फिर ध्वनियों को
शब्दों का जामा पहनकर
कविता लिख देता हूँ
बस एक शब्द.... " ॐ " ,
बार- बार लिखकर
कविता पूरी कर देता हूँ.
शब्द रूप देकर
कविता में नहीं
उतारना चाहता !!
आहत नाद से इतर
अन्तस् में उठती
ध्वनियों को शब्दों में
ढालना चाहता हूँ ,
आहत नाद भटकाता है !
तृष्णा जगाता है !
मन में इच्छाओं और
वासनाओं का
उपद्रव भड़काता है !
पहुँच जाता हूँ
उस संसार मे
जहाँ मन अटकता नहीं
वहां ध्वनियाँ हैं
लेकिन घर्षण रहित !!
यही है अनहद नाद...
भटकती चित्त वृत्तियों को
नियंत्रित करती
ध्वनियों का संसार !!
अंतस संगीत संसार में
वहीँ रम जाता हूँ
फिर ध्वनियों को
शब्दों का जामा पहनकर
कविता लिख देता हूँ
बस एक शब्द.... " ॐ " ,
बार- बार लिखकर
कविता पूरी कर देता हूँ.
.. विजय जयाड़ा 05.11.15
Wednesday, 4 November 2015
Tuesday, 3 November 2015
अंतर्मन
अंतर्मन
गऊ सानिध्य
न मिल पाना
महानगरीय मजबूरी है
लेकिन ___
कोई ये मान न ले
गऊ से हमारी दूरी है !
न मिल पाना
महानगरीय मजबूरी है
लेकिन ___
कोई ये मान न ले
गऊ से हमारी दूरी है !
धर्म ग्रन्थों ने मिलकर
गऊ का महत्व
स्वीकारा है
फिर गऊ पर
क्यों !!
होता इतना हंगामा है !!
गऊ का महत्व
स्वीकारा है
फिर गऊ पर
क्यों !!
होता इतना हंगामा है !!
दूध पिया
जननी का हमने
ममता का माँ हम नाम धरें
दूध पिया
गौ का भी हमने
क्यों ममता से इनकार करें !!
जननी का हमने
ममता का माँ हम नाम धरें
दूध पिया
गौ का भी हमने
क्यों ममता से इनकार करें !!
इंसान को दूध
पिलाया गऊ ने
मजहब का नहीं भेद किया,
फिर हमने
गऊ को आपस में
मजहब में क्यों बाँट दिया !!
पिलाया गऊ ने
मजहब का नहीं भेद किया,
फिर हमने
गऊ को आपस में
मजहब में क्यों बाँट दिया !!
बहुत हुई
गौ धन पर सियासत !!
इस पर अब लगाम करें,
दूध का कर्ज
अन्तर्मन से चुकाएँ___
जीवन अपना धन्य करें...
गौ धन पर सियासत !!
इस पर अब लगाम करें,
दूध का कर्ज
अन्तर्मन से चुकाएँ___
जीवन अपना धन्य करें...
Monday, 2 November 2015
Sunday, 1 November 2015
मजबूरी-मुखौटे और जमीर !!
मजबूरी-मुखौटे और जमीर !!
तोड़ दिया उसने वो दर्पण
बेबसी को दिखाता था
हारा हुआ बोझिल चेहरा
हमेशा उसे दिखाता था,
अब खरीद लिए कुछ
मनचाहे मुखौटे ! और
एक नया दर्पण !
मौके के मुताबिक
उचित मुखौटा लगाकर
घर से वो निकलता है
मौके पर इस्तेमाल करने को
कुछ दूसरे मुखौटे भी
अपने संग रखता है !
अलग-अलग मुखौटों से
समाज में स्वीकारा
और इज्जत पाता है,
नया दर्पण उसकी
बेबसी को नहीं बल्कि__
रुत्बा बयान करता है,
मुखौटे से ढ़का लेकिन
इच्छित प्रतिबिम्ब दिखाकर
हमेशा खुश रखता है
मगर !! हर रोज
एक लम्बी आह भरकर
कल की तैयारी में
मुखौटे सिराहने रखकर
वो सो जाता है,
लम्बे समय के बाद !!
मर चुका जमीर
फिर जीवित हो उठा है
उसको बार-बार पुकार रहा है
अंतर्द्वंद्व मे उलझा
सो नहीं पा रहा है !!
क्योंकि उसे ____
कल मुख्य अतिथि की
भूमिका निभानी है
मंच की शोभा बढानी है,
मुखौटों में रहकर समाज को
भ्रमित करने वाले लोगों से
समाज को जागृत
करने पर आयोजित
संगोष्टी उद्घाटित करनी है !!
बेबसी को दिखाता था
हारा हुआ बोझिल चेहरा
हमेशा उसे दिखाता था,
अब खरीद लिए कुछ
मनचाहे मुखौटे ! और
एक नया दर्पण !
मौके के मुताबिक
उचित मुखौटा लगाकर
घर से वो निकलता है
मौके पर इस्तेमाल करने को
कुछ दूसरे मुखौटे भी
अपने संग रखता है !
अलग-अलग मुखौटों से
समाज में स्वीकारा
और इज्जत पाता है,
नया दर्पण उसकी
बेबसी को नहीं बल्कि__
रुत्बा बयान करता है,
मुखौटे से ढ़का लेकिन
इच्छित प्रतिबिम्ब दिखाकर
हमेशा खुश रखता है
मगर !! हर रोज
एक लम्बी आह भरकर
कल की तैयारी में
मुखौटे सिराहने रखकर
वो सो जाता है,
लम्बे समय के बाद !!
मर चुका जमीर
फिर जीवित हो उठा है
उसको बार-बार पुकार रहा है
अंतर्द्वंद्व मे उलझा
सो नहीं पा रहा है !!
क्योंकि उसे ____
कल मुख्य अतिथि की
भूमिका निभानी है
मंच की शोभा बढानी है,
मुखौटों में रहकर समाज को
भ्रमित करने वाले लोगों से
समाज को जागृत
करने पर आयोजित
संगोष्टी उद्घाटित करनी है !!
... विजय जयाड़ा 01.11.15
Friday, 30 October 2015
Thursday, 29 October 2015
अमर बेल
अमर बेल
कुछ जड़ हीन बेलें
वृक्ष पर आश्रय पाती हैं
आश्रय दाता का
जीवन रस पीकर__
ऊंचा उठकर
उसको ही झुकाना चाहती है,
खुद के विस्तार की चाहत में
उपकार भुला देती है !
खुद हरियल होने की जिद में
आश्रय दाता को
निष्प्राण कर सुखा देती हैं !!
बहुत हैं ऐसी बेलें
जो समाज पर पनपती हैं
उस पर छा जाती हैं
ऊँची उठती हैं
वर्चस्व की चेष्टा में
उसी समाज को निगल चाहती हैं__
जिसने उसे आश्रय दिया
पोषित किया !!
जिसका जीवन रस पीकर
उसने जीवन जिया !!
शायद, यही आसान तरीका है !!
खुद को स्थापित करने का
“ अमर बेल “ बनकर
जीते जी ! अमर हो जाने का !!
वृक्ष पर आश्रय पाती हैं
आश्रय दाता का
जीवन रस पीकर__
ऊंचा उठकर
उसको ही झुकाना चाहती है,
खुद के विस्तार की चाहत में
उपकार भुला देती है !
खुद हरियल होने की जिद में
आश्रय दाता को
निष्प्राण कर सुखा देती हैं !!
बहुत हैं ऐसी बेलें
जो समाज पर पनपती हैं
उस पर छा जाती हैं
ऊँची उठती हैं
वर्चस्व की चेष्टा में
उसी समाज को निगल चाहती हैं__
जिसने उसे आश्रय दिया
पोषित किया !!
जिसका जीवन रस पीकर
उसने जीवन जिया !!
शायद, यही आसान तरीका है !!
खुद को स्थापित करने का
“ अमर बेल “ बनकर
जीते जी ! अमर हो जाने का !!
.. विजय जयाड़ा 29.10.15
Wednesday, 28 October 2015
Tuesday, 27 October 2015
Sunday, 25 October 2015
Saturday, 24 October 2015
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