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Saturday, 26 September 2015

मन शब्दांचल


........मन शब्दांचल.......

मन शब्दांचल सघन शब्द वन
शब्द आपस में उलझे हुए,
अमर्यादित शब्दों में जोर अधिक
सौम्य शब्द दिखे कुम्हलाते हुए,
अस्तित्व बचाने की खातिर
कुछ कंदराओं में जा छिपे,
कुछ हाँफते हुए दूर दिखे
जल की आस में तड़प रहे,
कुछ लटके तरु शाखों पर
शाखोों में जीवन तलाश रहे,
प्रदूषित मन सघन शब्द वन
सौम्य शब्द भटकते इधर-उधर
व्याकुल से अस्तित्व तलाश रहे !!
 
..विजय जयाड़ा 30/10/14


..अभिलाषा..


..अभिलाषा..

हे दयानिधे!
भावों में आ..
छल कपट से दूर
निरंतर कर्मों में....
कर्मपथ में आ.
हे करूणानिधि !
मिथ्या है जगत
ये सत्य है ...
मगर कण-कण में बसा
नियंता तू एक है
कर्म पथ से विचलन
मन चंचल
जब हो मेरा,
कर तिमिर अवसान..
गुरु बन मार्ग प्रशस्त कर .
हे भक्तवत्सल !!
भाव पूजा ही
समर्पण है चरणों में तेरे
भावरहित समर्पण
व्यवहार में नहीं मेरे,
कर विरक्त
मिथ्या आलंबनों से,
आडम्बरों से मोह भंग कर,
हे भक्तवत्सल !!
आलोकित कर ह्रदय....
ज्ञान-दीपक जला..
ह्रदय दीप जला !! 

.. विजय जयाड़ा

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे ..




 
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
   कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे-ए बयाँ और ..


..... उन्वान ...


.......... उन्वान ........

अंतस कुछ सुनसान सा था
शब्दों की गागर रीती थी
काँधे पर रख गागर
शब्दों के निर्झर पहुँच गया
निर्झर सूखा देख बहुत
असमंजस मन उदास हुआ
उद्विग्न देखता इधर-उधर
व्याकुल कारण तलाश रहा
ममनोदशा पर मेरी
बालक एक खिलखिला उठा
अलसाया अंतस मचल उठा
सूखा निर्झर भी बहने लगा
एक बयार बही पक्षी चहके
कविता को सरगम साज मिला
रीती गागर अब छलक गयी
गागर ले अब मैं लौट चला
कविता को उन्वान मिला.

..विजय जयाड़ा 

Wednesday, 23 September 2015

" अल्मोड़ा " ; एक उपयोगी घास

 

" अल्मोड़ा " ; एक उपयोगी घास


... खुदेंदु अल्मोड़ा ...
जिला कु नो नि सम्झ्याँ
घास कु नो अल्मोड़ा छ
पाखों बिट्टो मिळ्दु खूब
   स्वाद माँ खट्टू हौंदु छ..

चटणी खूब स्वाद बणदि
विटामिन “सी” भरपूर छ
आयरन भी खूब मिळ्दु
    ये सि बचपना कि प्रीत छ...

रूडियों मा गदगदा पत्तों की
चटणी कु अलग आनंद छ
ह्युंद किड्या सि हवे जांदु
    पाखा बिटटों लाल रंगणुं छ...

नौना बोळ्युं नि माणदा
कंडाळी पुराणु इलाज छ
कंडाळी का झमणाट कु
     अल्मोड़ा पेटेंट इलाज छ....

कंडाळी का साग तैं
अल्मोड़ा सुस्वादु बणोंदु छ
नया ज़माना माँ बैठक कि
    अल्मोड़ा शान अब बढोणु छ ...

उत्तराखंडी अब परदेशी ह्वेन
नौना बाळा कम ही जांणदन
पाखा बिटटो खड़युँ अल्मोड़ा
   सुनसान बाटों देखि खुदेणु छ !!

..विजय जयाड़ा 21.04.15
 

Sunday, 20 September 2015

स्नेह संवाद ......

 

.....स्नेह संवाद ......

धरती को जब छूता सूरज !!
तपती प्यासी धरती क्या करे !! .....
व्याकुल होते मूक जीवों का
धरती पर कौन ध्यान धरे !! .....
अपनी प्यास बुझाता मानव
जीवों का कौन थ्यान करे !! ......
मानव प्यास बुझाते ठंडे प्याऊं...
मीठा शरबत मानव में ही बंटे !!....
घर के बाग़-बगीचे सींचे हमने
गमलों का भी ध्यान धरा ...
हो गयी छुट्टी ! बंद हुए स्कूल !!
इन पौधों का कौन ध्यान करे ! .....
ठंडी हवा कूलर में बैठा
मन में एक भूचाल उठा .....
दौड़ पड़ा सुध लेने इनकी
व्याकुल कुम्हलाये उदास मिले !!
डाली और आंगन बैठे कागा भी ...
व्याकुल प्यासे निराश मिले !!....
रोटी के टुकड़े बिखराए
मिटटी कटोरा पानी भर रख कर
कागा टोली को शांत किया ..
घूँट-घूँट पानी पिलाकर
कुम्हलाये रूठे पौधों और ...
जीवों से सहज स्नेह संवाद किया.. 

.. विजय जयाड़ा


जी .. हुजूरी !!


जी .. हुजूरी !!

हम भी कभी थे
दुनिया के राजा..
चाँद सितारों पर भी
बजता था..
अपना ही बाजा..
बात मनवाना,
काम था अपना..
बड़े-बड़ों को
जिद्द पर झुकाना..
गलती अपनी,
दूसरे को उलाहना !
कल्पना में
 कहीं भी उड़ जाना !!
दोस्त बहुत थे
पक्के –पक्के
नाम अभी तक
याद हैं उनके..
लुक्कम छुप्पम
सांझ घनेरे
झगड़े बिना खेल
लगते थे अधूरे...
कंपाती सर्दी या
भीषण गर्मी,
मस्ती – मस्ती 
हरदम - हरदम,
 बारिश की..
परवाह नहीं थी,
बस्ता लटकाए
   छ्प्तम - छप्तम..
डाल पर चढ़
खूब इतराना,
 दोस्तों को.. 
  हर वक्त चिढाना !
अब सब हुआ
  गुजरा जमाना !!
रूठा बचपन
  बंद खिलखिलाना !!
दुनिया सिमटी,
 छिना राज पुराना !
मौज मस्ती का
 बीता जमाना !
दोस्तों की नहीं
अब अल्हड़ टोरी,
खेल है.. अब
  बस ..जी हुजूरी !!
खेल है.. अब
   बस...जी हुजूरी !!!

..विजय जयाड़ा 
 

रेज़ा रेज़ा दरकते हैं रोज़ ...



रेज़ा रेज़ा दरकते हैं रोज़
उम्मीदों के पहाड़ अब यहाँ
चलो गठरी आस की लेकर
अब कहीं और चला जाए !
लफ्फाजी और भोंडेपन में
अल मस्त है सारा शहर तेरा,
अब लौटकर हकीकत की
   दुनिया में .... बसर की जाए !!

.. विजय जयाड़ा


Friday, 18 September 2015

ऋषि बन कर समाधि लगाये ...


ऋषि बन कर समाधि लगाये,
  हिमालय ! तू आँखें मूंदे मौन है !!
  दुश्मन के हौसले बुलंद न फिर हों,
     मौन तोड़ने का आया फिर वक्त है !!


... विजय जयाड़ा


विडंबना !!



            ऋषिकेश से देहरादून जाते समय एक तरफ पकी हुई फसल को काटते किसान को देखा !!
     वहीँ आसमान में घुमड़ते बादलों का कारवां !! इस विचित्र स्थिति का शब्द चित्र उकेरने का प्रयास !!

   विडंबना !!

उमड़ते घुमड़ते मेघ
आच्छादित व्योम !
कहीं आह्लादित मन !
कहीं मुरझाता चितवन !
उपजता नैराश्य भाव
मन:स्थिति भोग की !
या कहूँ !!
धरती पुत्र की अंतर्वेदना !
या कहूँ, विडंबना !!

^^  विजय जयाड़ा/22.04.14

हरीतिमा खुशहाली ओढ़े ...



हरीतिमा खुशहाली ओढ़े 
ऊपर गगन विशाल हो
फूलों सा हँसता हो जीवन
गहन और विस्तीर्ण हो 
  
.. विजय जयाड़ा

 

Wednesday, 16 September 2015

मनोभाव ...




  मनोभाव
 
कुछ पाने की हवस में
खुद को भूल जाता है आदमी,
रह जाता है यहीं सब
साथ क्या ले जाता है आदमी !!

~ विजय जयाड़ा
 
 

बेमौसम " बुराँश " और " फ्यूंलि " !!



 

बेमौसम " बुराँश " और " फ्यूंलि " !!

बुरांश मंगसीर खिळि
खित्त हैंसी !!
फिंयुली पूस खिख्तै
खिल्ल खिल्ल !!
यूँ मासु बुरांश फ्यूंळि
फुळ्युं देख,
डाळा खौळ्यां देखदा रैन्
टुकुर टुकुर !!
पहाड़ खोदी खोदी
होटल बण ग्येन् !!
रोज रड़दन् पहाड़
अब घमा घम !!
फुळ खिळ्ना कु मौसम
अब भुळ ग्यन्
डाळियों बगैर रड़दा डांडा
दिखेंद्न सुन्न सुन्न !!

... विजय जयाड़ा


Saturday, 12 September 2015

खुद को बुरा कोई कहता नहीं,



खुद को बुरा कोई कहता नहीं,
दूसरों में खोट हर कोई खोजता यहाँ !
ढूंढने लगो जो खोट खुद में अगर,
    कोई खुद से बुरा नहीं दिखता यहाँ !! 
 विजय जयाड़ा
 
 
 
 

मिजाज-ए-तल्ख़ को ...



मिजाज-ए-तल्ख़ को
अंदाज़-ए-खुशनुमा दीजे
कि पुराने ज़ख्म को
    शोलों की मत हवा दीजे.....
खुश्क हुई जमीं अब बहुत
जज्बातों की बारिश के बिना
जज्बातों की नमीं से
   जमीं को अब सर सब्ज कीजे....
कर न पाए कोई बाहरी,
ईमारत बुलंद अब कभी यहाँ
कि जज़्ब-ए-दिल को
    सदा प्यार कि हवा दीजे ....

.. विजय जयाड़ा


मंजिल करीब आती हैं ...


मंजिल करीब आती हैं
कठिन राहों पर चलने के बाद
हासिल होता है कोई मुकाम
इम्तिहानों से गुज़र जाने के बाद..
 
... विजय जयाड़ा
 
 

Thursday, 10 September 2015

दास्ताँ


दास्ताँ

मंद मंद पवन बहती
    
स्नेहिल सा ....
कुछ गाता है ये ,
सुकुमार नव पुष्प
दिखलाने की जिद में 

    झूमता ...
   भीतर चला आता है ये !!
बतकही के मोह में
पास खींचा
   चला जाता हूँ ...
   जन्म से..
पुष्पित होने की
   दास्ताँ सुनकर ..
    कुछ पल को ...
   इसमें ही रम जाता हूँ ..


.. विजय जयाड़ा


Saturday, 5 September 2015

हम सबकी दिल्ली


 हम सबकी दिल्ली

 
यौवन पर चढ़ती
  उजड़ जाती दिल्ली !
  सल्तनत बदलती !
     निखर जाती दिल्ली....

गरजती कभी खामोश
  रहती थी दिल्ली !
शंहशाही इशारे पर
    थिरकती थी दिल्ली...

अब शंहशाह रहे न
  सल्तनत ही बाकी !
   अब दिखती यहाँ..
     सिर्फ रवानी जवानी....

दिल हिन्दुस्तां का
धड़कता यहाँ है
रौनक से लवलेज़
    हर रोज़ खिलती....

कुछ खास दुनिया से
   सबसे निराली !!
   सरसब्ज सतरंगी..
      हम सबकी दिल्ली ...

   ..विजय जयाड़ा 
 

Friday, 4 September 2015

दरस ..






शिक्षक दिवस पर हार्दिक बधाइयां व शुभ कामनाओं सहित ..



....... || दरस || .......

हक़ सबने जतलाया मगर
वो हमेशा ही खामोश थे !
मांस पिंड सुगढ़ करने में
    हमेशा ही बहुत व्यस्त थे ...
 
माता - पिता उनमे दिखे
सखा भी उनमे ही मिला
ज्ञान रस जी भर पिलाया
    नि:स्वार्थ प्रतिमूर्ति वो बने ...

अहर्निश चरण वंदन उनका
दिन उन्हें आज अर्पित किया
   रूप अनेकों हैं उनके, मगर..
    दरस सबका “गुरु“ में किया...
 
..विजय जयाड़ा 

Wednesday, 2 September 2015

सार्थक संवाद !!


|| सार्थक संवाद ||

व्यर्थ नहीं जाते
    कुछ संवाद ...
दीवारों से टकराकर
घायल लौट आते हैं
कुछ समा जाते हैं
धरती के गर्भ में,
अनसुने संवाद
तलाशते हैं ठौर
अनंत आकाश में,
  अनुकूल समय इंतजार में !!
वापसी की आस में,
करवट लेता है समय
लुके छिपे संवादो को
स्वीकारते हैं हम,
लौट आते हैं फिर वही
घायल, अनसुने
  धरती में समाए संवाद !!
पुनर्जन्म लेते हैं
वही सुप्त पड़े संवाद,
फिर होता है
नए युग का सूत्रपात,
क्योंकि !!
  व्यर्थ नहीं जाते कुछ संवाद ..
युग प्रवर्तक होते हैं
अनसुने, घायल
     धरती मे समाये....
   कुछ सार्थक संवाद !!

.. विजय जयाड़ा